Wednesday, November 23, 2016

 

शहर-ए- 'हाली '-… 'सलीम’ का बेताज बादशाह:

डा० दौलत राम 'साबिर'
पानीपती
तज़ल्लुम की  रुस्वाईयां  देख 'साबिर'
तग़ज्ज़ुल हया बेच कर खा गया हैं।



 

तेरे जलवों ने कभी अमृत मिलाया था जिसे

हाय उस बेबस को तेरे बाद भी जीना पड़ा

मौत को खामोशियों में मिल गया तुझको सुकूँ

जीने बाले को मगर खून--जिगर पीना पड़ा

डा 'साबिर' पानीपती

 पापा हुज़ूर डा० दौलत राम'साबिर' पानीपती का जो बेहतरीन क़ता जो हमारे घर की निशिस्तगाह के ऐन सामने वाली दीवार  में बनी हूई खूबसूरत अंगीठी के ऊपर रखी हुई हमारी अम्मी जान  मोहतरमा वीरों वाली की बाद-अज़-मर्ग ली हूई तस्वीर पर केप्शन की शक्ल में किताबतशुदा यह कता हर आने जाने बाले के दिल की गहराइयों में उतर कर एक अजीब सा दर्द पेदा कर देता था अम्मी के इन्तिकाल के समय मैं बहुत छोटी थी मगर इस क'तअ पढ़ कर महसूस होता था कि पापा हुज़ूर को अपनी रफ़ीफ़ा-ए-हयात से किस हद तक मुहब्बत थी 

 चुनांचि मार्च १९५४ में हमारी अम्मी जान मोहतरमा वीरां वाली की बेकक्त मौत बाद पापा हुज़ूर टूट  से गये थे और उनकी ज़िन्दगी एक जीता जागता नोहा--ग़म बन कर रह गई  अम्मी हुज़ूर उन्हें  ज़िन्दगी उस मोड़ पर  उस वक्त छोड़ गई थीं पापा हुज़ूर को उनके साथ की बेहद ज़्यादा ज़रुरत थी।

पारिवारिक फ़सल अभी बिलकुल कच्ची थी। उनके हम सब बहन भाई बहुत छोटे थे और  ज़ेर--तालीम थे। दोनों भाई  सुदर्शन और सोम  अभी कॉलेज में पढ़ रहे थे और हम तीनों बहने  छोटी थी ) मैं और बड़ी बहन कमला स्कूल जाने लगी थीं परन्तु सब से छोटी सरोज अभी घुटनों  के बल चलना ही सीख रही श्री चुनांचि पाप हुज़ूर 'साबिर'साहिब को बाप  के साथ-साथ माँ केराइज भी अंजाम देनेपड़ रहे थे। छोटा भाई सोम शर्मा १५ साल कि उम्र में फ़ौज में भर्ती हो गया  मगर पारिवारिक जीवन अपनी ही रपत्तार से ज़िन्दगी के ऊबड़ खाबड़ रास्तों पर चलने लगा  मैं रोज़ पापा हुज़ूर डाक्टर साबिर साहिब को रसोई में जमीन पर बैठ कर हर तरह के खाने पकाने का काम करते हुये देखती और आज उनके हाथ कि रोटी और मीठी चूरी , नमकीन पुलाव स्वाद याद है ! बहुत से शायर उनके शागिर्द थे जीने वह अपना परिवार ही समझते थे वो लोग भी  लोग सुबह के वक्त (खुसूसन इतवार के रोज़ ) घर के आँगन में उनके आस-पास,इधर उधर बैठ कर शौक़  से खाया करते थे। कभी-कभी महाशय अमरनाथ (अखबारों जाले) जो डा० साहिब के यहीं'मिलाप', 'प्रताप' और 'प्रभात' जैसे अपने जमाने के मशहूरउर्दू अखबार देने आते थे, वहीं सामने की  सीढियों पर बैठ कर चाय के साथ एक आध पराठे का लुत्फ़ लेते हुये शहर की किसी गर्मागर्म खबर पर तबसरा भी कर जाते
थे!
बस इतना ही याद है कि पापा हुज़ूर मुझे कुछ ज्यादा ही प्यार करते थे क्योंकि मैं अपने सब बहन भाइयों में सब से कम खूबसूरत थी!, पापा हुज़ूर एक डॉक्टर होने के साथ साथ जबरदस्त मनोवैगानिक भी थे, और वो नहीं चाहते थे कि मैं किसी एहसास-ए-कमतरी का शिकार हो जाऊं! चुनांचे मुझे प्यार से “ ग़ज़ल” कहकर पुकारते थे पंजाबी और उर्दू साहित्य के प्रति मेरा इतना लगाव भी उनकी ही देन है , माँ नहीं थी तो पापा माँ और पिता दोनों का प्यार देते थे,! रात को जब खा पीकर फ्री होते तो हम सब अपनी अपनी रजाई में बैठ जाते , पापा हुज़ूर अपनी कि किताब हीर वारिस shaah खोलते और और उसके किसी भी पन्ने से हमें सुनाने लगते

हीर आखदी जोगीया कूड़ आखेँ,
कौन रूठडे यार मनावंदा ई
ऐसा कोई न दिठा मैं ढून्ढ थक्की ,
जिहड़ा गियाँ नु मोड़ लिआवदा ई
बस वक़्त अपनी रवानगी के साथ यूँ ही धीरे धीरे गुज़र रहा था..............
 
धीरे धीरे तैर रहा था आशाओं का शिकारा
दूर सामने फ़ैल रहा तहा मस्ती भरा किनारा
सर पर हंसती मौत को हाय किसने किया इशारा
डूब गया मंझधार नें आकर धरती का बंजारा

शीतल जल में शोर न उठा, लहर न मुह से बोली
अब तुम होली खेलो यारो अपनी तो बस हो ली
एक रोज़ पापा ऐसे सोये कि सुबह उठे ही नहीं, शायद माँ के पास जाने कि उन्हें बहुत जल्दी थी, बहुत मुहब्बत थी उनकी अपनी शरीक-ए-हयात के साथ
मैं उस वक़्त कोई  11 साल कि थी , घर में पापा के शायर शागिर्द और दोस्तों का ताँता लगा रहता था सो उनके मुंह से निकले अल्फ़ाज़ मेरे भी जबान पर बैठ गए , कुछ समझ आने लगे ,काश पापा हुज़ूर थोड़ी देर और जी जाते तो उनसे ग़ज़ल के कुछ और खूबसूरत गुण सीख पाती और आज उनकी  ही तरह खूबसूरत ग़ज़ल कहकर उनके नाम को रौशन करती उनकी ही  तरह ग़ज़ल गुनगुनाती
ग़रक़ाब  हुई जाती है उम्मीद कि कश्ती
चुपचाप किनारे पे ख़ुदा देख रहा है
इंसां के सितम हाय मुकद्दर का तमाशा
शैतान भी खडा सहमा हुआ देख रहा है
पर मुझे नाज़ है पापा कि दुखतर-ए-बुलंद अख्तर होने पर , सो बड़े फ़ख्र क़ाराइन की खिदमत में पापा हुज़ूर का मजमुआ-ए-कलाम “ हसरतों का गुबार पेश कर रही हूँ 

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